जब बिकने लगे पत्रकारिता खबरें नहीं, शराब की पेटियाँ मिलती हैं….

कैमोर– जी हाँ पत्रकारिता जगत को शर्मसार करने वाली यह खबर है मप्र के कैमोर से जहां खुद को पत्रकार संगठन का महासचिव कहलाने वाले व्यक्ति की करतूत ने दूसरों पर उंगली उठाने वाले और सच को समाज के सामने लाने वाले पत्रकार जगत के दामन पर कलंक की ऐसी कालिख पोत दी जिसे मिटाने में तो काफी समय लगेगा ही, वहीं कैमोर की इस घटना ने पत्रकारिता के माथे पर ऐसा दाग छोड़ा है, जिसे न साबुन से धुला जा सकता है, न बयान से।

दाग़ ऐसा कि राष्ट्रीय पत्रकार कल्याण परिषद के राष्ट्रीय महासचिव कहलाने वाले पुष्पेंद्र सक्सेना की कार से 40 पेटी शराब बरामद हुई…. जी हाँ, एक दो नहीं बल्कि 40 पेटी! अब इसे पत्रकारिता का कल्याण कहें या कलंक? कभी यह पेशा समाज का आईना था, आज वही आईना धुंधला पड़ चुका है, क्योंकि उसके पीछे से खबरें नहीं झाँक रहे हैं बोतलों के कार्टून। जहां पद के आगे राष्ट्रीय, नाम के आगे पत्रकार, और पीछे चल रही हैं अवैध शराब की गाड़ियाँ, जी हाँ अब तो ऐसा लगता है कि यह वही दौर है जहाँ प्रेस कार्ड नहीं, प्रेशर कार्ड चलता है।

टीकमगढ़ निवासी यह सज्जन खुद को राष्ट्रीय पत्रकार कल्याण परिषद का राष्ट्रीय महासचिव होने का डिंडोरा पीटते फिरते हैं, पर इनकी गतिविधियाँ किसी तस्कर से कम नहीं। वहीं सूत्र कहते हैं कि इनके खिलाफ पहले से ही कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। यानी पत्रकारिता नहीं, जुर्मनामा इनकी असली बीट है।

वर्तमान में अब सवाल यह है ….
ऐसे लोगों को पत्रकार कहने की छूट आखिर कौन देता है? क्यों ऐसे संगठन बन रहे हैं जहाँ चंद हजार रुपये देकर कोई भी व्यक्ति इन संगठनों में राष्ट्रीय पदाधिकारी बन सकता है?

हालांकि, इस पूरे मामले पर राष्ट्रीय पत्रकार कल्याण परिषद ने स्पष्टीकरण जारी कर साफ़ शब्दों में कहा है कि पुष्पेंद्र सक्सेना का संगठन से कोई संबंध नहीं है, और वह संस्था का पदाधिकारी नहीं है। जिसका सोशल मीडिया पर परिषद ने स्पष्ट खंडन भी जारी किया है।

परन्तु ऐसी परिस्थिति में तब सवाल और भी गहरा हो जाता है ….
अगर यह व्यक्ति आपका सदस्य नहीं है, तो फिर इतने लंबे समय तक राष्ट्रीय महासचिव का तमगा लेकर कैसे घूमता रहा? और कैसे यह व्यक्ति आपकी संस्था के नाम पर लीपा पोती करता और आपके कान में जूं तक न रेंगी।

आज पत्रकारिता उस चैराहे पर खड़ी है जहाँ ईमानदार लोग शर्मिंदा, और फर्जी लोग बेख़ौफ़ हैं। नतीज़तन ऐसे तथाकथित पत्रकारों के द्वारा एकता के नाम पर प्रशासन और जनता दोनों को ब्लैकमेल किया जाता है। और ऐसे नकाब़पोश प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबसे आगे और सच्चाई के मोर्चे पर सबसे पीछे मिलते हैं, वे कैमरा तो रखते हैं, पर इनका फोकस हमेशा बोतल पर रहता है।

अब जनता का भरोसा टूट चुका है। शक के घेरे में अब पत्रकारिता है। और जब समाज को सत्य पर शक हो जाए, तो समझ जाईये कि असत्य ने अपनी प्रेस रिलीज़ जारी कर दी है।

आज एक बार फिर पत्रकारिता कटघरे में है, लेकिन इस बार आरोप किसी नेता या पुलिस पर नहीं….
इस बार मुजरिम खुद पत्रकार है, और जिसका सबूत… 40 पेटी शराब है।

 

कैमोर ब्यूरो गुलशन चक्रवर्ती

 

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