“65 करोड़ की सड़क में भ्रष्टाचार का ‘ब्लैकटॉप’: कागजों में विकास, जमीन पर घोटाला—तीन अफसर सस्पेंड, ठेकेदार कटघरे में”

मण्डला विकास के नाम पर जनता के टैक्स की रकम किस तरह कागजों में चमकती है और जमीन पर दम तोड़ देती है, इसका जीता-जागता उदाहरण मवई-कुड़ेला सड़क परियोजना बन गई है। करीब 65 करोड़ रुपये की लागत से बन रही 35 किलोमीटर लंबी यह सड़क अब निर्माण से ज्यादा भ्रष्टाचार की कहानी बयां कर रही है।

लोक निर्माण विभाग ने जब परतें खोलीं, तो अनियमितताओं का ऐसा जाल सामने आया जिसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए। नतीजतन, विभाग ने सख्त कार्रवाई करते हुए प्रभारी कार्यपालन यंत्री जी.एस. भलावी, एसडीओ संजय कुमार द्विवेदी और उपयंत्री विकास मरकाम को निलंबित कर दिया। लेकिन यह कार्रवाई जितनी तेज दिखती है, उतने ही तीखे सवाल भी छोड़ जाती है।
जांच में सामने आया कि निर्माण कार्य में गुणवत्ता की खुलेआम अनदेखी की गई। तकनीकी मानकों को दरकिनार कर घटिया सामग्री का इस्तेमाल हुआ और गुणवत्ता जांच महज कागजी औपचारिकता बनकर रह गई। स्थानीय लोगों के मुताबिक, जहां सड़क मजबूती की मांग करती थी, वहां कमजोर बेस और अधूरे काम ने पूरी परियोजना की पोल खोल दी।

इस पूरे मामले में ठेकेदार की भूमिका भी गंभीर संदेह के घेरे में है। अरुण कंस्ट्रक्शन जेवी और उससे जुड़े नेटवर्क पर सवाल उठ रहे हैं कि बिना मिलीभगत के इतना बड़ा खेल आखिर कैसे संभव हुआ। सूत्रों की मानें तो ‘सेटिंग’ के सहारे यह घोटाला लंबे समय तक दबा रहा, और जब सामने आया तो केवल अधिकारियों पर कार्रवाई कर मामला सीमित करने की कोशिश की जा रही है।
यह मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि सुनियोजित भ्रष्टाचार का प्रतीक नजर आता है—जहां बजट की स्वीकृति से लेकर निर्माण और निगरानी तक हर स्तर पर सिस्टम कमजोर पड़ा। इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ा है—ग्रामीण कनेक्टिविटी बाधित, किसानों को परेशानी और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ा।

निलंबन के बाद संबंधित अधिकारियों को सागर संभाग मुख्यालय से अटैच किया गया है और विभागीय जांच जारी है। लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है—क्या ठेकेदार पर कार्रवाई होगी? क्या नुकसान की भरपाई होगी? और सबसे अहम, क्या इस पूरे प्रोजेक्ट की निष्पक्ष जांच कर असली जिम्मेदारों को सजा मिलेगी?
मवई-कुड़ेला सड़क घोटाला एक चेतावनी है कि अगर सिस्टम की जड़ें नहीं सुधारी गईं, तो विकास की हर नई सड़क भ्रष्टाचार के गड्ढों में ही गुम होती रहेगी। अब वक्त आधे-अधूरे कदमों का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की सफाई का है—वरना जनता का भरोसा लौटाना मुश्किल होगा।
ब्यूरो चीफ विनोद यादव की कलम से…