“गरीबी की पटरियों पर दौड़ा हौसला: कैमोर की संध्या बर्मन बनी सहायक लोको पायलट, बचपन का सपना हुआ साकार”

कैमोर। कहते हैं—हार मान लो तो हार है, ठान लो तो जीत है और कैमोर की बेटी संध्या बर्मन ने इस कहावत को सिर्फ दोहराया नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी की पटरियों पर उसे दौड़ाकर सच साबित कर दिया।

एक समय था जब नन्ही संध्या अपने माता-पिता के साथ रेल यात्रा के दौरान मासूमियत से कह बैठी थी—“मैं भी ट्रेन चलाऊंगी”… उस वक्त पिता ने हालातों का हवाला देकर उसे समझा दिया, लेकिन उस छोटी सी बच्ची ने उस सपने को दिल की गहराइयों में बसा लिया।

आज वही संध्या, संघर्ष की लंबी यात्रा तय कर सहायक लोको पायलट बन चुकी है—और अब वह दिन दूर नहीं जब वह खुद इंजन की कमान संभालकर अपने सपनों को रफ्तार देगी।

कैमोर नगर की अमराईया पार बस्ती में रहने वाले केदार प्रसाद बर्मन की 24 वर्षीय बेटी संध्या का सफर आसान नहीं था। पिता एक ठेका श्रमिक, घर की सीमित आमदनी, और बड़े सपनों का बोझ—लेकिन हौसले इतने मजबूत कि हालात भी झुक गए।

अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने की चाहत आर्थिक तंगी के आगे दम तोड़ गई, लेकिन संध्या ने हार नहीं मानी। हिंदी माध्यम से ही पढ़ाई करते हुए उसने गणित संकाय से हायर सेकेंडरी शानदार अंकों से पास की। बीटेक का सपना गरीबी के कारण अधूरा रह गया, लेकिन उसने रास्ता बदला, मंजिल नहीं।

कटनी पॉलिटेक्निक कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया और फिर रेलवे की तैयारी में जुट गई। मेहनत रंग लाई और इसी वर्ष जबलपुर में आयोजित सहायक लोको पायलट परीक्षा में उसने सफलता का परचम लहरा दिया।

इन दिनों संध्या पश्चिम मध्य रेल के यांत्रिकी इंजीनियरिंग प्रशिक्षण केंद्र, डीजल लोको शेड में वरिष्ठ लोको पायलटों के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण ले रही है। छह माह के इस प्रशिक्षण के बाद वह आधिकारिक रूप से सहायक लोको पायलट के रूप में अपनी सेवाएं शुरू करेगी।

संध्या की सफलता सिर्फ एक नौकरी पाने की कहानी नहीं, बल्कि यह उस जिद, जुनून और जज्बे की मिसाल है जो संसाधनों की कमी के बावजूद सपनों को पटरी से उतरने नहीं देता।

आज संध्या का परिवार ही नहीं, पूरा कैमोर नगर उस ऐतिहासिक पल का इंतजार कर रहा है—जब उनकी बेटी इंजन की सीट पर बैठकर अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी मंजिल को हासिल करती नजर आएगी।

ब्यूरो, गुलशन चक्रवर्ती की कलम से

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